टॉप 19 मुंशी प्रेमचंद के अनमोल विचार व कथन

Most Inspirational Munshi Premchand Quotes & Thoughts In Hindi

मुंशी प्रेमचंद के सुविचार

मुंशी प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के बेहतरीन भारतीय लेखकों में से एक हैं। उनका मूल नाम धनपत राय प्रेमचंद है। उन्होंने बहुत सारी कविताये, उपन्यास और लेख लिखे हैं। आज हम मुंशी प्रेमचंद के कुछ अनमोल वचन–Premchand Hindi Quotes को पढेंगे।

मुंशी प्रेमचंद के सुविचार

कुल की प्रतिष्ठा भी सदव्यवहार और विनम्रता से होती है, हेकड़ी और रौब दिखाने से नहीं।

मुंशी प्रेमचंद

आदमी का सबसे बड़ा शत्रु उसका घमंड है।

मुंशी प्रेमचंद

सोने और खाने का नाम जिंदगी नहीं है, आगे बढ़ते रहने की लगन का नाम जिंदगी हैं।

मुंशी प्रेमचंद

जवानी आवेशमय होती है, वह क्रोध से आग बन जाती है तो करुणा से पानी भी।

मुंशी प्रेमचंद

जिस बंदे को दिन की पेट भर रोटी नहीं मिलती, उसके लिए इज्‍जत और मर्यादा सब ढोंग है।

मुंशी प्रेमचंद

अन्याय होने पर चुप रहना, अन्याय करने के ही समान है।

मुंशी प्रेमचंद

कार्यकुशल व्यक्ति की सभी जगह जरुरत पड़ती है।

मुंशी प्रेमचंद

देश का उद्धार विलासियों द्वारा नहीं हो सकता। उसके लिए सच्चा त्यागी होना पड़ेगा है।

मुंशी प्रेमचंद

निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है।

मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद के प्रेरक कथन

जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में है; उनका सुख छीनने में नहीं।

मुंशी प्रेमचंद

आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म ओर अधिकार है।

मुंशी प्रेमचंद

मन एक डरपोक शत्रु है जो हमेशा पीठ के पीछे से वार करता है।

मुंशी प्रेमचंद

न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं। इन्हें वह जैसे चाहती है, नचाती है।

मुंशी प्रेमचंद

अपनी भूल अपने ही हाथों से सुधर जाए, तो यह उससे कहीं ज्यादा अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।

मुंशी प्रेमचंद

मुंशी प्रेमचंद के हिंदी कोट्स

सौभाग्य उसी को प्राप्त होता है, जो अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रहते हैं।

मुंशी प्रेमचंद

विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई भी विद्यालय आज तक नहीं हुआ।

मुंशी प्रेमचंद

चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नहीं नुकसान पहुंचा सकता जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझ कर पी ना जाए।

मुंशी प्रेमचंद

आकाश में उड़ने वाले पंछी को भी अपना घर याद आता है।

मुंशी प्रेमचंद

दौलतमंद आदमी को जो सम्मान मिलता है, वह उसका नहीं, उसकी दौलत का सम्मान है।

मुंशी प्रेमचंद

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